दिवाली है या दीवाली
यह ब्लॉग 2016 में बनाया था। तब सोचा था कि जब भी वक्त मिलेगा तो इस पर कुछ सच्ची बातें लिखूंगा। सच्ची बातें लिखने और कहने का स्पेस तब से अब तक चार साल में बहुत तेजी से कम हुआ है। वैसे भी हमारा समाज सच से भागता है। तो एक मामूली आदमी के लिए सच कहना और भी कठिन है। खैर समाज के सच और झूठ पर फिर कभी।
इन चार सालों मेंं बहुत से लोगों से मुलाकातें हुईं। कॅरियर में भी आगे बढ़ने का अवसर मिला पर तब जो सवाल दिमाग में कौंधते थे वो आज और भी बड़े हो गए हैं। इनका जवाब और भी पेचीदा हो गया है। तब से अब तक व्यक्तिगत तौर पर बहुत कुछ खोया भी है और हासिल भी किया। इस पर फिर कभी विस्तार से पर आज बात सिर्फ दिवाली पर। अबकी बार दिवाली पर मेरठ में ही रहा। सेहत कुछ ठीक नहीं है। ठंड लगी है। दिन भर शरीर में दर्द रहा। लगा मानो अंदर ही अंदर बुखार हो। सोचा था हर दिन भागमभाग रहती है सो आज सुकून से घर में ही रहेंगे। वेदांशी आज नानी के घर चली गई। उसे गांव अच्छे लगते हैं। नानी का घर तो यूं भी बच्चों को अच्छा ही लगता है। हमारे न जाने से वो नाराज भी हुई। सुबह वो गई तो सोचा क्यों चली गई। घर में उसके न रहने पर अकेलापन महसूस होता है। शाम हुई तो लगा अच्छा रहा वो चली गई।
शाम हुई तो पूरा इलाका रोशनी से नहा गया। अबकी बार कोरोना महामारी का दौर है। बड़े पैमाने पर लोगों के रोजगार गए हैं। काम धंधे चौपट हैं। मौत कब किस पर झपट़टा मार दे कहा नहीं जा सकता। लेकिन शाम सात बजे से रात के एक बजे तक शहर में जो चला उसने अंदर तक हिलाकर रख दिया। हर तरफ पटाखों का शोर और भयंकर धुआं। करीब 11 बजे तो सांस लेना दूभर हो गया। लोग सोशन मीडिया पर दनादन वीडियो अपलोड करते रहे, पटाखे छुड़ाते हुए। किसी को इस बात की कोई परवाह नहींं कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पटाखे छुड़ाने पर रोक लगाई है। कोई चिंता नहीं कि एनसीआर में प्रदूषण लगातार रेड जोन में है। अब दिवाली के बाद तो यहांं लाजिमी तौर पर गैस चैंबर से भी बुरे हालात हो सकते हैं।
आज दिन में एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें पटाखे बेचने के आरोप में बुलंदशहर के एक शख्स को पुलिसवालों ने उठाकर जबरन जीप में ठूंस दिया। उसकी सात आठ साल की बेटी दौड़ते हुए आई और पापा पापा चिल्लाते हुए पुलिस की जीप में सिर मारने लगी। कुछ लोग वहां इसकी वीडियो भी बना रहे थे, शायद मीडिया कर्मी ही रहे होंगे, बाकियों को तो पुलिस खदेड़ देती। कैमरे की जद से बाहर ले जाकर एक मुटल्ले सिपाही ने उस बच्ची को कई चांटे रसीद कर दिए। वो चिल्लाती रही मुझे क्यों मार रहे हो मुझे क्यों मार रहे हो। वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो गई। कप्तान साहब तक भी पहुंची तो वह मिठाई के डिब्बे लेकर उस व्यक्ति को छुड़वा लाए और उसके घर तक पहुंचाया। इस घटना ने अंदर तक हिलाकर रख दिया। कितना झूठा है हमारा समाज। एक आदमी है जिसे पटाखे बेचने पर पुलिस पीट रही है। उसकी मासूम बच्ची को दिवाली के दिन पुलिसवाला पीट रहा है। और लाखों लोग हैं जो दिन ढलते ही करोड़ों रुपये के पटाखे शान से फोड़ रहे हैं। आखिर यह पटाखे कहां बने होंगे। कौन हैं इन फैक्टरियों के मालिक। कहां हैं पर्यावरण के लिए पटाखे न जलाने का आदेश जारी करने वाले। त्योहारों पर भी बेशर्मी और झूठ का ऐसा प्रदर्शन। क्या यही है भारतीय कल्चर। और मीडिया का हाल तो और भी बुरा है। मीडियाकर्मियों के पास तब खबर पहुंची जब कप्तान साहब मिठाई का डिब्बा लेकर पटाखे बेचने वाले शख्स को छुड़ाने पहुंचे और सिपाही को निलंबित कर दिया।खबर भी कप्तान साहब की तस्वीर के साथ निश्चित तौर पर यही बनेगी। सवाल यही है कि यह दिवाली है या मानसिक तौर पर समाज के दिवालिया होते जाने का एक प्रदर्शन मात्र।















